श्री अरुण कुमार उपाध्याय (धर्मज्ञ )-
१. ब्रह्म, अब्राहम-इनको ब्रह्म तथा अब्राहम मत भी कहा गया है।
सनातन का यह अर्थ नहीं है कि इसका आधार वेद सृष्टि के आरम्भ से था। तत्त्व रूप में वेद के स्तर आरम्भ से ही थे। असत् (अनुभव से परे) से सत् की सृष्टि हुई, आरम्भ में यह कुछ नहीं था-इसे शून्य वेद कहा गया है (ओड़िशा के पञ्चसखा कवियों की व्याख्या)। द्वे ब्रह्मणी वेदितव्ये शब्द ब्रह्म परं च यत्। शाब्दे ब्रह्मणि निष्णातः परं ब्रह्माधिगच्छति ॥ (मैत्रायणी उपनिषद्, ६/२२)
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शब्द रूप में वेद मन्त्रों का संकलन या संहिता तभी हुई जब वैज्ञानिक प्रगति द्वारा सृष्टि का आकार, कालक्रम, भूगोल-खगोल, खनिज, अन्न उत्पादन आदि विकसित हो चुके थे। लिखित तथा कथित भाषा के समन्वय के बाद ही सूक्तों का संकलन हुआ (ऋग्वेद में गणपति सूक्त, २/२३, बृहस्पति सूक्त, १०/७१)। इन सबका संकलन पुराण साहित्य द्वारा हुआ, जिसके एकीकरण द्वारा वेद की उत्पत्ति ब्रह्मा द्वारा हुई।
इदमेव पुराणेषु पुराण पुरुषस्तदा। (२)
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पुराणं सर्व शास्त्राणां प्रथमं ब्रह्मणा स्मृतम्। अनन्तरं च वक्त्रेभ्यो वेदास्तस्य विनिर्गताः॥३॥
पुराणमेकमेवासीत् तदाकल्पान्तरेऽनघ। त्रिवर्गसाधनं पुण्यं शतकोटि प्रविस्तरम्॥४॥ (मत्स्य पुराण, ५३/२-१०)
नारद पुराण (१/२४/१६-२३) में विस्तार से है।
ब्रह्मा देवानां प्रथमं सम्बभूव विश्वस्य कर्ता भुवनस्य गोप्ता। स ब्रह्म विद्यां सर्व विद्या प्रतिष्ठा मथर्वाय ज्येष्ठ पुत्राय प्राह। अथर्वणे यां प्रवदेत ब्रह्मा ऽथर्वा तां पुरो वाचाङ्गिरे ब्रह्म-विद्याम्। स भरद्वाजाय सत्यवहाय प्राह भरद्वाजो ऽङ्गिरसे परावराम्। (मुण्डकोपनिषद्,१/१/१,२)-आङ्गिरस भरद्वाज, बृहस्पति के ज्ञान सूक्त (ऋक्, १०/७१)-भरद्वाज गोत्र के ३ प्रवर।
यह सनातन या अपौरुषेय इस अर्थ में है कि किसी एक व्यक्ति का विचार नहीं है, सनातन सत्य है, तथा सभी ज्ञान का आधार या समन्वय है।
सम्पूर्ण सृष्टि को एक मान कर उसे पुरुष या ब्रह्म कहते हैं।
इसके विपरीत अब्राहम मत ब्रह्म का एकत्व नहीं मानते है। अपने मत के अनुसार सर्वोच्च सत्ता को मानते हैं, तथा अन्य द्वारा कल्पित सर्वोच्च सत्ता का विरोध करते है। यह किसी का व्यक्तिगत विचार है। वह अन्य से समन्वय नहीं करता, बल्कि अपने प्रचार के लिए अन्य की निन्दा करता है। अपने पूर्व के प्रवर्तकों की निन्दा तथा विरोध करता है। विचार प्रवाह खण्डित करने को दिति कहा गया है-दो अवखण्डने (पाणिनीय धातु पाठ, ४/३९)। इसका विपरीत अदिति है, जिसका अनन्त चक्र है-अदितिर्जातम्, अदितिर्जनित्वम् (शान्ति पाठ, ऋक्, १/८९/१०, अथर्व, ७/६/१, वाज. यजु, २५/२३)। दैत्य असुर हैं, आदित्य देव हैं।
असीरिया (असुर राज्य) के राजा नबोनासर (संस्कृत का लवणासुर) ने अपनी पुस्तक बेबिलोनिका में लिखा है कि उसने अपने पूर्व के सभी उल्लेख एकत्र कर नष्ट कर दिये जिससे लगे कि सभ्यता का आरम्भ उसी से हुआ। अब्राहम पन्थ के सम्प्रदायों की यही प्रवृत्ति रही है। वे मान ही नही सकते कि उनके पूर्व भी वैज्ञानिक विकास हुआ था। यदि कोई प्रमाण दिखाया जाय तो कहेंगे कि अन्य ग्रहों के प्राणियों का काम है, भले ही बृहस्पति, शनि आदि पर जीवन के प्रमाण नहीं मिलें।
भारत में भी व्यक्तिवादी सम्प्रदायों ने सनातन की निन्दा की है, पर उसी ज्ञान को थोड़े शब्द बदल कर अपना सिद्धान्त बनाया तथा वैदिक ज्ञान को उसकी नकल कहा जैसे योग दर्शन का नाम योगाचार किया, त्रिपुरा रहस्य के १० महाविद्या को १० प्रज्ञा पारमिता नाम दिया, गौतम के न्याय दर्शन को गौतम बुद्ध का कहा (सिद्धार्थ बुद्ध उनसे १३०० वर्ष पूर्व थे, जिनको एक बना दिया गया है)।
२. एक विचार की भिन्न व्याख्या- इस प्रकार की एक कहानी बृहदारण्यक उपनिषद् अध्याय ५, ब्राह्मण २ में है। प्रजापति के पास शिक्षा के लिए मनुष्य, देव और असुर गये। तीनों को प्रजापति ने एक ही अक्षर का उपदेश दिया-द। तीनों ने अपनी प्रवृत्ति के अनुसार अलग अलग अर्थ लगाया। देवों ने समझा के वे अधिक भोग करते हैं, अतः उनको द = दमन का उपदेश दिया है। मनुष्यों ने समझा कि वे अधिक सम्पत्ति का उत्पादन और सञ्चय करते हैं, अतः उनको द = दान केलिए कहा। असुरों ने समझा कि वे बहुत क्रूरता करते हैं, अतः उनको द = दया का उपदेश दिया है।
अतः शब्दों का अर्थ एक है या एक जैसा है, पर प्रवृत्ति के अनुसार उनके विपरीत अर्थ हैं। मनुष्यों के २ मुख्य वर्ग हैं-जो स्वयं अपनी जरूरत की वस्तुओं का यज्ञ द्वारा उत्पादन करते हैं (गीता, ३/१० में प्रजापति का आदेश) वे देव हैं। पुरुष सूक्त १६ के अनुसार देव यज्ञों के परस्पर मिलन द्वारा उन्नति के शिखर पर पहुंचे। इसके विपरीत असुर वे हैं जो असु = शक्ति द्वारा सम्पत्ति लूटने की चेष्टा करते हैं। कोलम्बस आदि लुटेरे विश्व को लूटने चले तो पोप ने विश्व के २ भाग किए-एक भाग स्पेन की लूट तथा दूसरा भाग पुर्तगाल की लूट का क्षेत्र बनाया। बाद में फ्रांस, इंगलैण्ड तथा डच भी इसमें हिस्सा लेने लगे। इनका एक ही नियम था कि लूट का १/५ भाग राजा को देंगे। ६२२ ई. से इस्लाम में भी यही नियम चला। मुहम्मद बिन कासिम आदि लुटेरे जो भी लूटते थे उसका १/५ भाग खलीफा को देते थे। इसमें स्त्रियां भी सम्पत्ति मानी जाती हैं, जिनको माल-ए-गनीमत कहते हैं। विरोधी प्रवृत्ति के कारण शाब्दिक अर्थ एक होते हुए भी व्यवहार में विपरीत हो गया है।
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